इतिहास कुछ नहीं है, संघर्ष की कहानी
गाँधी, शिवा, भगत सिंह और झाँसी वाली रानी
कोई भी कायरो का इतिहास क्यों पढ़ेगा।
संग्राम ......................................
आओ लड़ें स्वयं के कलुषों से कल्मषों से,
भोगों से वासना से रोगो के राक्षसों से,
कुंदन वाही बनेगा जो आग में तपेगा।
संग्राम ......................................
घेरा समाज को है, कुंठा कुरीतियों ने,
व्यसनों ने रुढियो ने निर्मम अनीतियो ने,
इनकी चुनौतियों से, है कौन जो लडेगा।
संग्राम ......................................
चिंतन चरित्र में अब विकृति बढ़ी हुई है,
चाहूँ ओर कौरवो की सेना खाड़ी हुई है।
क्या पार्थ इन छड़ों भी व्योमोह में फंसेगा। ,
संग्राम ......................................

मशालें ले कर चलना कि जब तक रात वांकी है,
सभल कर हर कदम रखना कि जब तक रात वांकी है,
मशालें ले ...........................................
मिले मंसूर को सूली, जहर सुकरात के हिस्से,
रहेगा जुर्म सच कहना, कि जब तक रात वांकी है,
मशालें ले ...........................................
पसीने की तो तुम छोड़ो, लहू मजदुर का यारों,
कि सस्ता पानी सा बहेगा, कि जब तक रात वांकी है,
मशालें ले ...........................................
तेर मस्तक पे होगा हर पल विद्रोह का निशा,
नहीं ये जोश कम होगा, कि जब तक रात वांकी है,
मशालें ले ...........................................
अंधेरों की अदालत में, है क्या फरियाद का फायदा,
तू कर संग्राम ये साथी, कि जब तक रात वांकी है,
मशालें ले ...........................................

Friday, May 10, 2013

राम से भगवान राम तक ------------------------२


पिछले अंक में मैंने राम राज के कुछ बिन्दूओ पर प्रकाश डाला था, उसी क्रम में ..............
अनार्यो को जब आर्यो के साथ जोड़ कर जिस व्यवस्था का निर्माण किया गया उसमें कर्म आधारित वर्ण व्यवस्था को जन्म आधारित वर्ण व्यवस्था में बदल दिया गया और सभी अनार्यो को शुद्र वर्ग में मिला दिया गया जिससे भारी जनाक्रोष उत्पन्न हो गया. इस जनाक्रोश को शांत करने के लिये अश्वमेघ यज्ञ किया गया राम द्वारा स्थापित व्यवस्था को मनवाने के नाना उपाय किये गये किन्तु इस जनाक्रोष को को दवाया न जा सका. राम के जीवन काल के बाद शुद्रो की दो शाखाये कर दी गयी. वो लडाका अनार्य जो किसी भी कीमत पर राम की व्यवस्था को मानने को तैयार नहीं थे. उनको चन्द्रवंशीय क्षत्रिय के रूप में स्वीकार कर लिया गया. इस प्रकार समाज कई उपवर्णों में विभक्त होने लगा, ब्राह्मणों का वो वर्ग जो राम की व्यवस्था को मानने को तैयार नहीं था, ऋषिकुल की परंपरा में चला गया. दूसरा वह वर्ग जो राम द्वारा स्थापित व्यवस्था का समर्थ था ब्राहमण वर्ग के रूप में जाना गया. क्षत्रिय की दो शाखाएँ हो गयी एक सूर्यवंशीय दूसरी चन्द्रवंशीय. वैश्य वर्ग को भी अपना कारोबार बढ़ने के लिए जिस वर्ग की आवश्यकता हुयी वह वानिया के रूप में जानी गयी. शुद्र सेवक वर्ग के रूप में अस्प्रश्य नहीं था. किन्तु इस वर्ण विभाजन के वाद भी समाज में कोई स्थिरता नहीं आयी और राजकीय कार्य करना असुविधा जनक होने लगा तो रक्त समिश्रण से एक अन्य सेवक वर्ग उत्पन्न किया गया. जिसे हम पंचम वर्ग का शूद्र कह सकते हैं. प्रारंभिक शूद्र वर्ग जो अस्प्रश्य नहीं था आसानी से वैश्य वर्ग में समिलित हो गया. किन्तु पंचम बर्ग का शुद्र अस्पर्श्य हो गया जोकि अनुलोम और प्रतिलोम संबंधो से उत्पन्न हुयी थी. इस प्रकार जातियों का निर्माण हुआ यह जातिप्रथा की अत्यंत जटिल संरचना है . जोकि राम के जीवन काल के बाद दूसरी और तीसरी पीडी की है.
इस प्रकार जन्म आधारित वर्ण व्यवस्था का वर्गीकरण निम्न प्रकार कर सकते हैं
ब्राहमण :- ब्राहमण (राम की व्यवस्था के समर्थक आर्य) और ऋषि (राम की व्यवस्था के विरोधी आर्य और अनार्य)
क्षत्रिय :- सूर्यवंशीय(आर्य) और चन्द्रवंशीय(अनार्य)
वैश्य :- वैश्य(आर्य) और शूद्र (जो अस्पर्श्य नहीं)
शुद्र :- अनुलोम(उच्चवर्णीय पुरुष और निम्न वर्णीय स्त्री) और प्रतिलोम (उच्चवर्णीय स्त्री और निम्न पुरुष) संवंधो से उत्पन्न संताने (जो अस्पर्श्य हैं )
उपरोक्त वर्गीकरण को ध्यान से देखे तो आज समाज में किसी भी विचार धारा का सनातनी मिल जाये वह अपने उत्तर की तलास कर सकता है. अनुलोम और प्रतिलोम संबंधो के रूप में विवाह आठ प्रकारो  को मान्यता दी गयी, जो जातिप्रथा का आधार बने.
इस जाती व्यवस्था का हिसाब-किताब रखने के लिए पंडो का एक वर्ग तैयार किया गया, जिसकी रोजी रोटी की तलास कर्म-कांडो में की गयी. जिसका मुख्य काम नामकरण करना था. व्यवस्था के अनुसार वह इस प्रकार से नामकरण करता था की उस व्यक्ति के वर्ण का पता चल जाता था. मनु ने इस जाति व्यवस्था को ठोस आधार दिया और मनुस्मृति का निर्माण किया. इस प्रकार राम के काल से कृष्ण के काल तक आते-आते समाज जन्म आधारित वर्ण व्यवस्था से जन्म आधारित जाति व्यवस्था तक पहुँच गया. जातिप्रथा को जन साधारण द्वारा आत्मसात कर लिया गया था. इस जाति प्रथा को व्यावस्थित करने में पंडो की मत्वपूर्ण भूमिका रही है. जाति व्यवस्था में ब्राहमण वर्ग की यह एक मात्र ऐसी जाति है  जो पूरे समाज से सीधे संपर्क में थी. कर्म-कांड इनकी रोजी रोटी के साधन थे इसलिए सच्चई से बहुत दूर राम की महिमा की कपोल कथाओ का निर्माण कर आम जन को राममय बनाया. आयुर्वेद और जादू-टोना  का ज्ञान होने की वजह से यह आसानी से किसी के घर की महिलाओ तक पहुँच जाते थे इसलिए विवाह संवंधो को जोड़ने के लिये भी यह अत्यंत उपयोगी सिद्ध हुये.
भाग तीन में कुछ और जानकारियों के साथ फिर मिलेगे. ..............