किसी व्यक्ति का कर्म उसको अच्छा और बुरा बनाता है। किसी वर्ग विशेष के हित में काम करने वाला साधारण मनुष्य भी उस वर्ग के लिए ईश्वर तुल्य हो जाता है। राम के सम्पूर्ण जीवन का आप अध्ययन करें तो आप पाएंगे उनके जीवन में ऐसा कुछ भी नहीं कि उनको ईश्वर तुल्य रखा जा सके! वह पैगम्बर हैं तो किसी वर्ग विशेष के लिए जिस प्रकार मोहम्मद साहब और डॉ आंबेडकर हुए हैं ! सम्पूर्ण मानवता के लिए दिया जाने वाला दर्शन और वर्ग विशेष के लिए दिये जाने वाले दर्शन में अन्तर है। तीसरा दर्शन निहित स्वार्थ की पूर्ति की कूटनीति हो सकता है। निहित स्वार्थो को आगे रख कर दिया जाने वाला दर्शन और कार्य एक राजनेता और राजा का होता है। किसी वर्ग विशेष के लिए किया जाने वाला कार्य और दर्शन किसी पैगम्बर का होता है और सम्पूर्ण मानवत के लिये किया जाने वाला कार्य ही ईश्वर का हो सकता है। किसी कम्पनी या संगठन के मालिक को अपने कर्मचारी को पुरष्कार या दंड देने के लिए शास्त्र धारण करने की आवश्यकता नहीं होती तो उस परम पिता परमेश्वर को क्यों होने लगी। इस आधार पर आप मनुष्य, पैगम्वर(ईश्वर का प्रतिनिधि) और ईश्वर में भेद कर सकते हैं। सनातन संस्कृति में राजा को ईश्वर का प्रतिनिधि (पैगम्बर) कहा गया है। राम ने स्वमं को कभी ईश्वर नहीं कहा जबकि कृष्ण ने स्वमं को ईश्वर कहा है। कृष्ण के जीवन का आप अध्ययन करें तो आपको उनके ईश्वर होने की झलक मिलेगी। उनके सम्पूर्ण कार्य में अहम् की झलक नहीं मिलती और उनको रणछोड़ दास कहा जाता है क्योकि एक परम पिता परमेश्वर अपने बच्चो को कैसे मार सकता है जवकि वो मानवीय गुणों को जनता है। शिशुपाल के वध में भी यही चीज झलकती है। कृष्ण पर कुछ आरोप लगाये जाते है उनके चरित्र को लेकर किन्तु ध्यान रहे कृष्ण अपने समय के अकेले बालक थे जो पूतना से बच सके, तो गाँव की शेष माताओ का प्रेम तो उनको मिलना ही था निश्चय ही उन्होंने एक से अधिक माताओ का दूध पिया होगा क्योंकि स्तन से दूध निकालना स्त्री की मजबूरी है लेकिन इसको गाय के रूप में दिखाया गया है साहित्य की द्रष्टि से ऐसा लिखे जाने में कोई बुरायी नहीं है। छोटा वच्चा माँ के स्तन खीचता ही रहता है, माँ के लिये वह उसका छोटा प्रेमी होता है किन्तु साहित्य की भाषा में इसे वात्सल्य कहा गया है कृष्ण इस धरती के पहले ऐसे व्यक्ति होंगे जो वात्सल्य से परिपूर्ण रहे .........कहने का तात्पर्य है कि कृष्ण की बाल लीलाओ में उनके ईश्वर होने की झलक मिलती है किन्तु राम में तो कही भी ऐसा नहीं है।
फिर राम को ईश्वर किसने बनाया। कई बार भगवान राम कहा जाता है जबकि भगवान का मतलब होता है भग+वान अर्थात भग को चलाने वाला लिंग या लम्पट व्यक्ति किन्तु यह मुर्ख लोगो का संयोजन हो सकता है व्यापक अर्थ में लिया जाये तो यह अर्थ निकलेगा जिसने कुछ नया कर दिखाया हो, तो राम ने ऐसा क्या नया किया ?
राम-रावण का युद्ध आर्यों और अनार्यो(द्राविड़ या आदिवासी) के वीच का अंतिम बड़ा युद्ध था जिसके बाद लगभग सभी अनार्यो को आर्यों की सत्ता स्वीकार करनी पड़ी। उस समय तक वर्ण व्यवस्था के चार वर्ण ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र कर्म प्रधान थे, किन्तु जब अनार्यो को भी वर्ण व्यवस्था से जोड़ा गया तो इसकी कर्म प्रधानता समाप्त कर दी गयी और इसका आधार जन्म कर दिया गया और सभी अनार्यो को शुद्र वर्ण में समायोजित कर दिया गया। यह कार्य राम ने किया किया था। ब्राह्मण वर्ण की श्रेष्ठता उसके कर्म की प्रधानता थी किन्तु जन्म के आधार पर हो जाने पर वे अलसी हो गये, यह पहली जातिगत आरक्षण व्यवस्था थी जिसे राम ने लागू किया था। जन्म आधारित वर्ण व्यवस्था का कठोरता से पालन कराया गया। यहाँ तक की शूद्र वर्ण का कोई व्यक्ति जप, तप, ध्यान और ज्ञान की बात करता तो उसकी जान ले ली जाती थी। इसकी शुरुआत राम ने स्वमं शम्बूक ऋषि का वध करके की थी। शूद्रो को पशु के तुल्य कर दिया गया था और कोई भी उच्च वर्ण का व्यक्ति इनकी हत्या का उतना ही दंड पाता था जितना एक पशु की हत्या का, यह सभी नियम मनुस्मृति में कठोरता से संकलित हैं तथा शूद्रो (द्राविड़ या आदिवासी) का इतिहास नष्ट कर दिया गया। उनके आपस में भी इन विषयों की चर्चा करने और सुनने पर प्रतिवंध लगा दिया गया। उस समय ज्ञान संवाद के माध्यम से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक जाता था इसलिए शुद्रो का इतिहास नष्ट हो गया और आज का शूद्र भ्रमित है। रावण की काल्पनिक कथाओ के आधार पर इतनी निंदा की गयी कि कोई भी अनार्य अब अपने आप को द्राविड़वंश से जोड़ कर देखना ही नहीं चाहता, वह अपने आप को क्षत्रिय वंश में खोजता रहता है। एक मनोवैज्ञानिक नियम है कि दुश्मन को बहुत शक्तिशाली और अनाचारी बताओ फिर उस पर अपनी विजय दिखाओ, तो स्वतः आप और अधिक शक्तिशाली हो जाओगे। राज कवि वाल्मीकि ने ऐसा ही किया, राम की शासन व्यवस्था की जानकारी देने वाला यह एक मात्र मान्य ग्रन्थ है और किसी को लिखने ही नहीं दिया गया। शम्बूक ऋषि राम राज्य का सच लिख्र रहे थे इसीलिए राम ने उनका वध कर दिया। किन्तु जो चरित्र दोषों से परिपूर्ण हो, तो कितनी भी सफाई से लिखा जाये कुछ न कुछ छूट ही जायेगा। वाल्मीकि के बाद तुलसी ने राम के शासन के दोषों को और कम करके दिखने का प्रयास किया और गुरु परम्परा की धार्मिक दुकान सजाने का एक जोरदार हथियार दिया। राम ने कोई जनहित का काम नहीं किया, न ही किसी ग्रन्थ में इसका कोई प्रमाण मिलता है कि उन्होंने कोई धर्मशालायें बनवयी हो या कुएं तलब खुदवाये हों या तकनीक के विकास के लिए कोई कार्य किया हो, गुरु वशिष्ठ ने उनको राजा की शिक्षा दी ही नहीं उन्हें गुरु सेवा की शिक्षा मिली थी और गुरु परम्परा के लिए उन्होंने सत्ता का दुर्पयोग किया था क्योकि उस समय सत्ता का केंद्र गुरु वशिष्ठ का आश्रम था जैसे आज मनमोहन सिंह की सत्ता का केंद्र सोनिया का आवास है।
दशरथ की मजबूरी उनकी कमजोरी थी वो भली भांति जानते थे कि राम उनके पुत्र नहीं हैं इसलिए वह वशिष्ठ को रोक न सके और वशिष्ठ उनके चारो पुत्रो को लेकर जंगल में चले गये, पुत्र प्रेम की पीड़ा किसी पुरुष के अंदर मिलती है तो ज्ञात इतिहास में तीन ही व्यक्ति हुए हैं दशरथ, द्रणाचार्य और बाबर जो पुत्र वियोग में मृत्यु को प्राप्त हुए फिर भी दशरथ का प्रेम अति उच्चकोटि का है क्योकि राम उनके पुत्र (नियोग से उत्पन्न) नहीं थे फिर भी उनको अत्याधिक स्नेह था। राम का झुकाव कभी भी दशरथ के प्रति नहीं रहा। दशरथ एक जन प्रिय राजा थे और जनता के हित में ढोंगी ऋषियों की बातो में नहीं आते थे। जंगल में दो ही लोग रहते थे ढोंगी ऋषि(अपवाद को छोड़ दें) और मूल जातियां(द्राविड़, आदिवासी या अनार्य) राजा दशरथ का झुकाव मूल जातियों के प्रति था। इसलिए वशिष्ठ ने एक षड्यंत्र के तहत दशरथ के ही धर्मपुत्रो से इन जातियों की हत्या करायी। यह मूल जातियों और ढोंगी ऋषियों के वीच वर्चस्व की लड़ाई थी यदि वह स्वमं कुछ करते तो उनको राज दंड मिलता इसलिए उन्होंने यह काम दशरथ के धर्मपुत्रो से कराया। राम ने कभी भी रघुकुल रीति का पालन नहीं किया। उन्होंने राजधर्म का भी पालन नहीं किया उन्होंने राजा विहीन राज को छोड़कर सिर्फ गुरु परम्परा का पालन किया। वह इतना घमंडी था कि जनता के अनुरोध को ठुकरा कर रात के अँधेरे में अपनी पत्नी और अपने भाई लक्ष्मण के साथ भाग गया था जिस कारण रात में उसकी खड़ायूँ छुट गयी थी यदि एक वाक्य में कहूँ तो राम अच्छे परिवार और अच्छे राज्य की नक्कारा संतान थी। जनता का प्रेम उसको पैत्रिक सम्पति के रूप में मिला था, उसे भी वह सभाल कर न रख सका। फिर भी उसको भगवान राम कहा जाता है तो निश्चय ही वह किसी के लिए तो भगवन होगा, उसको भगवान किसने बनाया?
वह राज्य की जनता के लिए भगवान नहीं था। क्योंकि राज्य की जनता के लिए उसने कोई जनहित का काम नहीं किया था। उसने ब्राहम्ण परम्परा को जन्मगत आधार दिया था गुरु परम्परा को आगे बढाया था इसलिए उन सभी ढोंगी ऋषियों के निहित स्वार्थो की सिद्धि हुयी थी। नए ब्राह्मणों के प्रवेश पर हमेसा के लिए रोक लग गयी थी। अनार्यो के रूप में द्विज वर्ण को एक वहुत बड़ा सेवक वर्ग मिल गया था जिस से वे वेगार करा सकते थे। वह एक अल्प बुद्धि का शासक था जिसने दूसरे की घर की आग से अपने घर को जला लिया था। उसकी प्रतिक्रिया स्वरुप उसने शूद्रो का ऐसा दमन किया है जिसका प्रभाव आज तक है उसने कर्म आधारित वर्ण व्यवस्था को जाति में जन्म के आधार पर तवदील कर दिया था। उसके इस कार्य को आप ऐसे देख सकते है, पांच साल प्रधान मंत्री रहने के बाद भी मनमोहन सिंह लोक सभा का चुनाव नहीं जीत सके, प्रतिक्रिया स्वरुप उनके UPA-2 का शासन काल भ्रष्टाचार, घोटालो और जन आतंक से भरा हुआ है। गुरु परंपरा के उन लोगो ने उसे भगवान वना दिया है और इन्ही लोगो ने आम जनता से उसकी पूजा करायी है। आज भी आम जनता राम मंदिर की मांग नहीं करती, वह माँग करती है रोटी, कपडा और मकान की बिजली, पानी और सड़क की, गुरु परम्परा के तथाकथित धर्माचार्य और संगठन मांग करते हैं राम मंदिर की, राम राज्य की ताकि देवदासी प्रथा को बढाया जा सके और हरिजनों की उत्पत्ति की जा सके ..........
मेरी उपरोक्त बातें आप लोगो की समझ में आ रही होगी मेरा यह लेख उन लोगो के लिए है जो अनावश्यक रूप से राम की महिमा मंडान करते है और बिना जाने उसका समर्थन करते हैं ............ निश्चय ही इस लिख का विरोध भी गुरु परम्परा के लोगो द्वारा किया जायेगा यदि उनकी धार्मिक दुकाने प्रभावित होती हैं
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