इतिहास कुछ नहीं है, संघर्ष की कहानी
गाँधी, शिवा, भगत सिंह और झाँसी वाली रानी
कोई भी कायरो का इतिहास क्यों पढ़ेगा।
संग्राम ......................................
आओ लड़ें स्वयं के कलुषों से कल्मषों से,
भोगों से वासना से रोगो के राक्षसों से,
कुंदन वाही बनेगा जो आग में तपेगा।
संग्राम ......................................
घेरा समाज को है, कुंठा कुरीतियों ने,
व्यसनों ने रुढियो ने निर्मम अनीतियो ने,
इनकी चुनौतियों से, है कौन जो लडेगा।
संग्राम ......................................
चिंतन चरित्र में अब विकृति बढ़ी हुई है,
चाहूँ ओर कौरवो की सेना खाड़ी हुई है।
क्या पार्थ इन छड़ों भी व्योमोह में फंसेगा। ,
संग्राम ......................................

मशालें ले कर चलना कि जब तक रात वांकी है,
सभल कर हर कदम रखना कि जब तक रात वांकी है,
मशालें ले ...........................................
मिले मंसूर को सूली, जहर सुकरात के हिस्से,
रहेगा जुर्म सच कहना, कि जब तक रात वांकी है,
मशालें ले ...........................................
पसीने की तो तुम छोड़ो, लहू मजदुर का यारों,
कि सस्ता पानी सा बहेगा, कि जब तक रात वांकी है,
मशालें ले ...........................................
तेर मस्तक पे होगा हर पल विद्रोह का निशा,
नहीं ये जोश कम होगा, कि जब तक रात वांकी है,
मशालें ले ...........................................
अंधेरों की अदालत में, है क्या फरियाद का फायदा,
तू कर संग्राम ये साथी, कि जब तक रात वांकी है,
मशालें ले ...........................................

Friday, May 10, 2013

राम से भगवान राम तक ------------------------२


पिछले अंक में मैंने राम राज के कुछ बिन्दूओ पर प्रकाश डाला था, उसी क्रम में ..............
अनार्यो को जब आर्यो के साथ जोड़ कर जिस व्यवस्था का निर्माण किया गया उसमें कर्म आधारित वर्ण व्यवस्था को जन्म आधारित वर्ण व्यवस्था में बदल दिया गया और सभी अनार्यो को शुद्र वर्ग में मिला दिया गया जिससे भारी जनाक्रोष उत्पन्न हो गया. इस जनाक्रोश को शांत करने के लिये अश्वमेघ यज्ञ किया गया राम द्वारा स्थापित व्यवस्था को मनवाने के नाना उपाय किये गये किन्तु इस जनाक्रोष को को दवाया न जा सका. राम के जीवन काल के बाद शुद्रो की दो शाखाये कर दी गयी. वो लडाका अनार्य जो किसी भी कीमत पर राम की व्यवस्था को मानने को तैयार नहीं थे. उनको चन्द्रवंशीय क्षत्रिय के रूप में स्वीकार कर लिया गया. इस प्रकार समाज कई उपवर्णों में विभक्त होने लगा, ब्राह्मणों का वो वर्ग जो राम की व्यवस्था को मानने को तैयार नहीं था, ऋषिकुल की परंपरा में चला गया. दूसरा वह वर्ग जो राम द्वारा स्थापित व्यवस्था का समर्थ था ब्राहमण वर्ग के रूप में जाना गया. क्षत्रिय की दो शाखाएँ हो गयी एक सूर्यवंशीय दूसरी चन्द्रवंशीय. वैश्य वर्ग को भी अपना कारोबार बढ़ने के लिए जिस वर्ग की आवश्यकता हुयी वह वानिया के रूप में जानी गयी. शुद्र सेवक वर्ग के रूप में अस्प्रश्य नहीं था. किन्तु इस वर्ण विभाजन के वाद भी समाज में कोई स्थिरता नहीं आयी और राजकीय कार्य करना असुविधा जनक होने लगा तो रक्त समिश्रण से एक अन्य सेवक वर्ग उत्पन्न किया गया. जिसे हम पंचम वर्ग का शूद्र कह सकते हैं. प्रारंभिक शूद्र वर्ग जो अस्प्रश्य नहीं था आसानी से वैश्य वर्ग में समिलित हो गया. किन्तु पंचम बर्ग का शुद्र अस्पर्श्य हो गया जोकि अनुलोम और प्रतिलोम संबंधो से उत्पन्न हुयी थी. इस प्रकार जातियों का निर्माण हुआ यह जातिप्रथा की अत्यंत जटिल संरचना है . जोकि राम के जीवन काल के बाद दूसरी और तीसरी पीडी की है.
इस प्रकार जन्म आधारित वर्ण व्यवस्था का वर्गीकरण निम्न प्रकार कर सकते हैं
ब्राहमण :- ब्राहमण (राम की व्यवस्था के समर्थक आर्य) और ऋषि (राम की व्यवस्था के विरोधी आर्य और अनार्य)
क्षत्रिय :- सूर्यवंशीय(आर्य) और चन्द्रवंशीय(अनार्य)
वैश्य :- वैश्य(आर्य) और शूद्र (जो अस्पर्श्य नहीं)
शुद्र :- अनुलोम(उच्चवर्णीय पुरुष और निम्न वर्णीय स्त्री) और प्रतिलोम (उच्चवर्णीय स्त्री और निम्न पुरुष) संवंधो से उत्पन्न संताने (जो अस्पर्श्य हैं )
उपरोक्त वर्गीकरण को ध्यान से देखे तो आज समाज में किसी भी विचार धारा का सनातनी मिल जाये वह अपने उत्तर की तलास कर सकता है. अनुलोम और प्रतिलोम संबंधो के रूप में विवाह आठ प्रकारो  को मान्यता दी गयी, जो जातिप्रथा का आधार बने.
इस जाती व्यवस्था का हिसाब-किताब रखने के लिए पंडो का एक वर्ग तैयार किया गया, जिसकी रोजी रोटी की तलास कर्म-कांडो में की गयी. जिसका मुख्य काम नामकरण करना था. व्यवस्था के अनुसार वह इस प्रकार से नामकरण करता था की उस व्यक्ति के वर्ण का पता चल जाता था. मनु ने इस जाति व्यवस्था को ठोस आधार दिया और मनुस्मृति का निर्माण किया. इस प्रकार राम के काल से कृष्ण के काल तक आते-आते समाज जन्म आधारित वर्ण व्यवस्था से जन्म आधारित जाति व्यवस्था तक पहुँच गया. जातिप्रथा को जन साधारण द्वारा आत्मसात कर लिया गया था. इस जाति प्रथा को व्यावस्थित करने में पंडो की मत्वपूर्ण भूमिका रही है. जाति व्यवस्था में ब्राहमण वर्ग की यह एक मात्र ऐसी जाति है  जो पूरे समाज से सीधे संपर्क में थी. कर्म-कांड इनकी रोजी रोटी के साधन थे इसलिए सच्चई से बहुत दूर राम की महिमा की कपोल कथाओ का निर्माण कर आम जन को राममय बनाया. आयुर्वेद और जादू-टोना  का ज्ञान होने की वजह से यह आसानी से किसी के घर की महिलाओ तक पहुँच जाते थे इसलिए विवाह संवंधो को जोड़ने के लिये भी यह अत्यंत उपयोगी सिद्ध हुये.
भाग तीन में कुछ और जानकारियों के साथ फिर मिलेगे. ..............


    

Saturday, February 16, 2013

अपने को पहचानो और शर्म करो क्या तुम हिन्दू हो .......?


आरएसएस और हिन्दू संगठन देखें यह है मोदी के विकास की लहर, क्या ऐसा हिंदुस्तान चाहिए? 

मै पहले ही कह चूका हूँ . शूद्र सावधान रहें अगली जंग हिन्दूओ और शुद्रो के वीच होनी है ....


मोदी जी और उनके समर्थक बताएं,


क्या in लोगो पर अश्प्रश्यता निवारण अधिनियम के अंतर्गत कार्यवाही होगी या केवल लीपा-पोती .....?

Sunday, February 10, 2013

राम से भगवन राम तक .............



    किसी व्यक्ति का कर्म उसको अच्छा और बुरा बनाता है। किसी वर्ग विशेष के हित में काम करने वाला साधारण मनुष्य भी उस वर्ग के लिए ईश्वर तुल्य हो जाता है। राम के सम्पूर्ण जीवन का आप अध्ययन करें तो आप पाएंगे उनके जीवन में ऐसा कुछ भी नहीं कि उनको ईश्वर तुल्य रखा जा सके! वह पैगम्बर हैं तो किसी वर्ग विशेष के लिए जिस प्रकार मोहम्मद साहब और डॉ आंबेडकर हुए हैं ! सम्पूर्ण मानवता के लिए दिया जाने वाला  दर्शन और वर्ग विशेष के लिए दिये जाने वाले दर्शन में अन्तर है। तीसरा दर्शन निहित स्वार्थ की पूर्ति की कूटनीति हो सकता है। निहित स्वार्थो को आगे रख कर दिया जाने वाला दर्शन और कार्य एक राजनेता और राजा का होता है। किसी वर्ग विशेष के लिए किया जाने वाला कार्य और दर्शन किसी पैगम्बर का होता है और सम्पूर्ण मानवत के लिये किया जाने वाला कार्य ही ईश्वर का हो सकता है। किसी कम्पनी या संगठन के मालिक को अपने कर्मचारी को पुरष्कार या दंड देने के लिए शास्त्र धारण करने की आवश्यकता नहीं होती तो उस परम पिता परमेश्वर को क्यों होने लगी। इस आधार पर आप मनुष्य, पैगम्वर(ईश्वर का प्रतिनिधि) और ईश्वर में भेद कर सकते हैं। सनातन संस्कृति में राजा को ईश्वर का प्रतिनिधि (पैगम्बर) कहा गया है। राम ने स्वमं को कभी ईश्वर नहीं कहा जबकि कृष्ण ने स्वमं को ईश्वर कहा है। कृष्ण के जीवन का आप अध्ययन करें तो आपको उनके ईश्वर होने की झलक मिलेगी। उनके सम्पूर्ण कार्य में अहम् की झलक नहीं मिलती और उनको रणछोड़ दास कहा जाता है क्योकि एक परम पिता परमेश्वर अपने बच्चो को कैसे मार सकता है जवकि वो मानवीय गुणों को जनता है। शिशुपाल के वध में भी यही चीज झलकती है। कृष्ण पर कुछ आरोप लगाये जाते है उनके चरित्र को लेकर किन्तु ध्यान रहे कृष्ण अपने समय के अकेले बालक थे जो पूतना से बच सके, तो गाँव की शेष माताओ का प्रेम तो उनको मिलना ही था निश्चय ही उन्होंने एक से अधिक माताओ का दूध पिया होगा क्योंकि स्तन से दूध निकालना स्त्री की मजबूरी है लेकिन इसको गाय के रूप में दिखाया गया है साहित्य की द्रष्टि से ऐसा लिखे जाने में कोई बुरायी नहीं है। छोटा वच्चा माँ के स्तन खीचता ही रहता है, माँ के लिये वह उसका छोटा प्रेमी होता है किन्तु साहित्य की भाषा में इसे वात्सल्य कहा गया है कृष्ण इस धरती के पहले ऐसे व्यक्ति होंगे जो वात्सल्य से परिपूर्ण रहे .........कहने का तात्पर्य है कि कृष्ण की बाल लीलाओ में उनके ईश्वर होने की झलक मिलती है किन्तु राम में तो कही भी ऐसा नहीं है।

     फिर राम को ईश्वर किसने बनाया। कई बार भगवान राम कहा जाता है जबकि भगवान का मतलब होता है भग+वान  अर्थात भग को चलाने वाला लिंग या लम्पट व्यक्ति किन्तु यह मुर्ख लोगो का संयोजन हो सकता है व्यापक अर्थ में लिया जाये तो यह अर्थ निकलेगा जिसने कुछ नया कर दिखाया हो, तो राम ने ऐसा क्या नया किया ?

        राम-रावण का युद्ध आर्यों और अनार्यो(द्राविड़ या आदिवासी) के वीच का अंतिम बड़ा युद्ध था जिसके बाद लगभग सभी अनार्यो को आर्यों की सत्ता स्वीकार करनी पड़ी। उस समय तक वर्ण व्यवस्था के चार वर्ण ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र कर्म प्रधान थे, किन्तु जब अनार्यो को भी वर्ण व्यवस्था से जोड़ा गया तो इसकी कर्म प्रधानता समाप्त कर दी गयी और इसका आधार जन्म कर दिया गया और सभी अनार्यो को शुद्र वर्ण में समायोजित कर दिया गया। यह कार्य राम ने किया किया था। ब्राह्मण वर्ण की श्रेष्ठता उसके कर्म की प्रधानता थी किन्तु जन्म के आधार पर हो जाने पर वे अलसी हो गये,  यह पहली जातिगत आरक्षण व्यवस्था थी जिसे राम ने लागू किया था। जन्म आधारित वर्ण व्यवस्था का कठोरता से पालन कराया गया। यहाँ तक की शूद्र वर्ण का कोई व्यक्ति जप, तप, ध्यान और ज्ञान की बात करता तो उसकी जान ले ली जाती थी। इसकी शुरुआत राम ने स्वमं शम्बूक ऋषि का वध करके की थी। शूद्रो को पशु के तुल्य कर दिया गया था और कोई भी उच्च वर्ण का व्यक्ति इनकी हत्या का उतना ही दंड पाता था जितना एक पशु की हत्या का, यह सभी नियम मनुस्मृति में कठोरता से संकलित हैं तथा शूद्रो (द्राविड़ या आदिवासी) का इतिहास नष्ट कर दिया गया। उनके आपस में भी इन विषयों की चर्चा करने और सुनने पर प्रतिवंध लगा दिया गया। उस समय ज्ञान संवाद के माध्यम से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक जाता था इसलिए शुद्रो का इतिहास नष्ट हो गया और आज का शूद्र भ्रमित है। रावण की काल्पनिक कथाओ के आधार पर इतनी निंदा की गयी कि कोई भी अनार्य अब अपने आप को द्राविड़वंश से जोड़ कर देखना ही नहीं चाहता, वह अपने आप को क्षत्रिय वंश में खोजता रहता है। एक मनोवैज्ञानिक नियम है कि दुश्मन को बहुत शक्तिशाली और अनाचारी बताओ फिर उस पर अपनी विजय दिखाओ, तो स्वतः आप और अधिक शक्तिशाली हो जाओगे। राज कवि वाल्मीकि ने ऐसा ही किया, राम की शासन व्यवस्था की जानकारी देने वाला यह एक मात्र मान्य ग्रन्थ है और किसी को लिखने ही नहीं दिया गया। शम्बूक ऋषि राम राज्य का सच लिख्र रहे थे इसीलिए राम ने उनका वध कर दिया। किन्तु जो चरित्र दोषों से परिपूर्ण हो, तो कितनी भी सफाई से लिखा जाये कुछ न कुछ छूट ही जायेगा। वाल्मीकि के बाद तुलसी ने राम के शासन के दोषों को और कम करके दिखने का प्रयास किया और गुरु परम्परा की धार्मिक दुकान सजाने का एक जोरदार हथियार दिया। राम ने कोई जनहित का काम नहीं किया, न ही किसी ग्रन्थ में इसका कोई प्रमाण मिलता है कि उन्होंने कोई धर्मशालायें बनवयी हो या कुएं तलब खुदवाये हों या तकनीक के विकास के लिए कोई कार्य किया हो, गुरु वशिष्ठ ने उनको राजा की शिक्षा दी ही नहीं उन्हें गुरु सेवा की शिक्षा मिली थी और गुरु परम्परा के लिए उन्होंने सत्ता का दुर्पयोग किया था क्योकि उस समय सत्ता का केंद्र गुरु वशिष्ठ का आश्रम था जैसे आज मनमोहन सिंह की सत्ता का केंद्र सोनिया का आवास है। 

       दशरथ की मजबूरी उनकी कमजोरी थी वो भली भांति जानते थे कि राम उनके पुत्र नहीं हैं इसलिए वह वशिष्ठ को रोक न सके और वशिष्ठ उनके चारो पुत्रो को लेकर जंगल में चले गये, पुत्र प्रेम की पीड़ा किसी पुरुष के अंदर मिलती है तो ज्ञात इतिहास में तीन ही व्यक्ति हुए हैं दशरथ, द्रणाचार्य और बाबर जो पुत्र वियोग में मृत्यु को प्राप्त हुए फिर भी दशरथ का प्रेम अति उच्चकोटि का है क्योकि राम उनके पुत्र (नियोग से उत्पन्न) नहीं थे फिर भी उनको अत्याधिक स्नेह था। राम का झुकाव कभी भी दशरथ के प्रति नहीं रहा। दशरथ एक जन प्रिय राजा थे और जनता के हित में ढोंगी ऋषियों की बातो में नहीं आते थे। जंगल में दो ही लोग रहते थे ढोंगी ऋषि(अपवाद को छोड़ दें) और मूल जातियां(द्राविड़, आदिवासी या अनार्य) राजा दशरथ का झुकाव मूल जातियों के प्रति था। इसलिए वशिष्ठ ने एक षड्यंत्र के तहत दशरथ के ही धर्मपुत्रो से इन जातियों की हत्या करायी। यह मूल जातियों और ढोंगी ऋषियों के वीच वर्चस्व की लड़ाई थी यदि वह स्वमं कुछ करते तो उनको राज दंड मिलता इसलिए उन्होंने यह काम दशरथ के धर्मपुत्रो से कराया। राम ने कभी भी रघुकुल रीति का पालन नहीं किया। उन्होंने राजधर्म का भी पालन नहीं किया उन्होंने राजा विहीन राज को छोड़कर सिर्फ गुरु परम्परा का पालन किया। वह इतना घमंडी था कि जनता के अनुरोध को ठुकरा कर रात के अँधेरे में अपनी पत्नी और अपने भाई लक्ष्मण के साथ भाग गया था जिस कारण रात में उसकी खड़ायूँ छुट गयी थी यदि एक वाक्य में कहूँ तो राम अच्छे परिवार और अच्छे राज्य की नक्कारा संतान थी। जनता का प्रेम उसको पैत्रिक सम्पति के रूप में मिला था, उसे भी वह सभाल कर न रख सका। फिर भी उसको भगवान राम कहा जाता है तो निश्चय ही वह किसी के लिए तो भगवन होगा, उसको भगवान किसने बनाया?

    वह राज्य की जनता के लिए भगवान नहीं था। क्योंकि राज्य की जनता के लिए उसने कोई जनहित का काम नहीं किया था। उसने ब्राहम्ण परम्परा को जन्मगत आधार दिया था गुरु परम्परा को आगे बढाया था इसलिए उन सभी ढोंगी ऋषियों  के निहित स्वार्थो की सिद्धि हुयी थी। नए ब्राह्मणों के प्रवेश पर हमेसा के लिए रोक लग गयी थी। अनार्यो के रूप में द्विज वर्ण को एक वहुत बड़ा सेवक वर्ग मिल गया था जिस से वे वेगार करा सकते थे। वह एक अल्प बुद्धि का शासक था जिसने दूसरे की घर की आग से अपने घर को जला लिया था। उसकी प्रतिक्रिया स्वरुप उसने शूद्रो का ऐसा दमन किया है जिसका प्रभाव आज तक है उसने कर्म आधारित वर्ण व्यवस्था को जाति में जन्म के आधार पर तवदील कर दिया था। उसके इस कार्य को आप ऐसे देख सकते है, पांच साल प्रधान मंत्री रहने के बाद भी मनमोहन सिंह लोक सभा का चुनाव नहीं जीत सके, प्रतिक्रिया स्वरुप उनके UPA-2 का शासन काल भ्रष्टाचार, घोटालो और जन आतंक से भरा हुआ है। गुरु परंपरा के उन लोगो ने उसे भगवान वना दिया है और इन्ही लोगो ने आम जनता से उसकी पूजा करायी है। आज भी आम जनता राम मंदिर की मांग नहीं करती, वह माँग करती है रोटी, कपडा और मकान की बिजली, पानी और सड़क की, गुरु परम्परा के तथाकथित धर्माचार्य और संगठन मांग करते हैं राम मंदिर की, राम राज्य की ताकि देवदासी प्रथा को बढाया जा सके और हरिजनों की उत्पत्ति की जा सके ..........    

       मेरी उपरोक्त बातें आप लोगो की समझ में आ रही होगी मेरा यह लेख उन लोगो के लिए है जो अनावश्यक रूप से राम की महिमा मंडान करते है और बिना जाने उसका समर्थन करते हैं ............ निश्चय ही इस लिख का विरोध भी गुरु परम्परा के लोगो द्वारा किया जायेगा यदि उनकी धार्मिक दुकाने प्रभावित होती हैं 

Friday, January 4, 2013

आरएसएस के निशाने पर .................





RSS का असली चेहरा संघ प्रमुख मोहन भागवत जी की जुवानी  " बलात्कार इंडिया में होते है भारत में नहीं " क्या संघ प्रमुख और उनके समर्थक बताने का कष्ट करेगें " भांवरी देवी इंडियन थी या भारतीय ?" उसके लिए आरएसएस ने क्या किया ?

मै यह खोजने का प्रयास कर रहा था कि RSS जैसे संगठन ने इस असंगठित जन आन्दोलन में भाग क्यों नहीं लिया?  जबकि छात्रायें पुलिस द्वारा सड़को पर पीटी जाती रही, यह किन माँ बहनों की रक्षा के लिए लाठी की ट्रेनिंग देते हैं? मोहन भगवत के इस व्यान के बाद मै यह दावे के साथ कह सकता हूँ ओवेसी और आरएसएस में कोई अंतर नहीं है यह लोग केवल नफरत वांट सकते हैं मोहब्बत नहीं.

एक बार फेसबुक पर मैंने प्रश्न छोड़ा था आरएसएस  ने देश को क्या दिया ?
इस प्रश्न के उत्तर में जवाव आया आरएसएस ज्वाइन करलो खुद पता चल जायेगा।
दूसरा उत्तर आया तुमने देश को क्या दिया ?
तीसरा कोई उत्तर नहीं आया।

इसके बाद क्या समझा जाये?

या तो आरएसएस ने देश को कुछ नहीं दिया या जो दिया है, वो बताये जाने योग्य नहीं है.

जितना मैंने जाना है वो है उसके अनुसार आरएसएस ने जो देश को दिया है वह है :-
         राष्ट्रीय स्तर पर ......
१. हिन्दू मुस्लिमो के बीच नफरत
२. जाति प्रथा को बनाये रखने के सूत्र
३. बाबरी मस्जिद का ध्वस्तीकरण
४. हिन्दू मुस्लिम दंगा
५  गुजरात दंगा
६ आने वाले समय में हिन्दू शूद्र दंगा देगी
७ और कुछ दिया हो तो आरएसएस स्वम् वता दे।
        अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर .............
1. हिन्दू मुस्लिम दंगा ........
2. धार्मिक उन्माद

शूद्रो को यह भली भांति समझ लेना चाहिए मुस्लिमो के बाद आरएसएस का अगला निशाना शूद्र ही हैं, इसलिए सभी हिन्दू मुस्लिम दंगो में शुद्रो को ही आगे रखा जाता है, शूद्र राजपूत काल को याद कर लें, ब्राह्मणों ने अपनी रक्षा के लिए विदेशी आक्रंताओ का उपनैन संस्कार करके क्षदम क्षत्रीय बनाया जिन्हें राजपूत कहा जाता है,  और इसके बाद (जो आज के शूद्र हैं कभी यह क्षत्रीय थे ) शूद्रो पर घोर अत्याचार किया, जब  कृष्ण क्षत्रीय हैं तो यादव शूद्र कैसे हो गये? कार्य की प्रधानता का आधार था तो बडौदा के महाराज शूद्र कैसे हो गये? जो कुर्मी समाज से थे।   आरएसएस के लोग  बताये।
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Wednesday, December 5, 2012

एक मित्र ने लिखा आज शौर्य दिवस है


एक मित्र ने लिखा (
आज भी फैजाबाद जिले के आस पास के सूर्यवंशीय क्षत्रिय सिर पर पगड़ी नहीं बांधते, जूता नहीं पहनते, छाता नहीं लगाते, उन्होने अपने पूर्वजों के सामने ये प्रतिज्ञा ली थी की जब तक श्री राम जन्मभूमि का उद्धार नहीं कर लेंगे तब तक जूता नहीं पहनेंगे, छाता नहीं लगाएंगे, पगड़ी नहीं बाधेंगे।

तत्कालीन कवि जयराज के एक दोहे मे ये भीष्म प्रतिज्ञा इस प्रकार वर्णित है ॥
जन्मभूमि उद्धार होय,
जा दिन बरी भाग।
छाता जग पनही नहीं, और न बांधहि पागा॥

http://ashutoshnathtiwari.blogspot.in/2012/12/5history-of-ayodhya-and-ram-temple-5_5.html
आप सभी को आज ही शुभकामनाये . . . .बताइये किस बात की?
जय श्री राम
आज भी फैजाबाद जिले के आस पास के सूर्यवंशीय क्षत्रिय सिर पर पगड़ी नहीं बांधते, जूता नहीं पहनते, छाता नहीं लगाते, उन्होने अपने पूर्वजों के सामने ये प्रतिज्ञा ली थ
ी की जब तक श्री राम जन्मभूमि का उद्धार नहीं कर लेंगे तब तक जूता नहीं पहनेंगे, छाता नहीं लगाएंगे, पगड़ी नहीं बाधेंगे।

तत्कालीन कवि जयराज के एक दोहे मे ये भीष्म प्रतिज्ञा इस प्रकार वर्णित है ॥
जन्मभूमि उद्धार होय,
जा दिन बरी भाग।
छाता जग पनही नहीं, और न बांधहि पागा॥   आशुतोष की कलम से...शांति नहीं क्रांति)

आशुतोष जी यह ज्ञात इतिहास है जो आपने लिखा, वो कितने दुष्ट रहे होगें जिन्होंने इतिहास तक नहीं लिखने दिया। 600 इसवी में सम्राट हर्ष के समय भारत बौद्ध राष्ट्र था, सरे बौद्धों को बेरहमी से मार डाला गया तथा शूद्र बनाया गया। उनका इतिहास तक मिटा दिया गया। वो कितने जालिम रहे होगे कभी सोचा। भारत में पैदा हुआ बौद्ध धर्म भारत से मिट गया। मिटने वाले क्या कोई बाहर के थे?   


जो मित्र मुझसे असहमत हैं k.mittra@rediffmail.com पर ई-मेल कर सकते हैं अथवा 09335122064 पर संपर्क करें। ब्लोग्स में टिपण्णी कर सकते "अनार्यो की खोज "(http://anaryokikhoj.blogspot.in/2012/11/0-1.html ) "आगे की यात्रा" (http://aagekiyatra.blogspot.in) आचार्य रजनीश एक नवीन विचारधारा (http://aacharyrajneesh.blogspot.in/2012/11/blog-post_12.html) हैं।

Sunday, November 18, 2012

छी-छी.....क्या लिखा अपने ........?

आदरणीय डा0 रेवा नंदन द्विवेदी जी उर्फ़ मामा जी,

छी-छी.....क्या लिखा अपने .......................? .(Reva Nandan Dwivedi Sale ji mujhey Aapse kuchh isi tarah ke ans ki ummid thi mai agyaniyo se age sawal nahi puchunga)
     
    कह दो कि हम ब्राह्मण कुल में पैदा होने के वाद भी तुम्हारे एक प्रश्न का भी उत्तर देने में सक्षम नहीं हैं,  तो अज्ञानी आप हो या हम ?

         मेरे सामने पाखंड नहीं चल सकता द्विवेदी जी इसलिए पाखंड से आपको बहार
निकालना जरुरी है। किसी को कुछ दो तो उसका पात्र खली होना चाहिए आप घमंड से इतना अधिक भरे हुए हो की मेरे उत्तर को सभालने की सामर्थ नहीं है आपमें, इसलिए पहले अपना पात्र खली करके आओ, आपके छः प्रश्नों का उत्तर मैं आने ब्लॉग अनर्यो की खोज में शीघ्र ही दूगाँ पर वो आपके लिए नहीं होगें क्योकि भरे हुए पात्र में कुछ भी डालने की मैं मुर्खता नहीं करता।

           आपके इस उत्तर से एक बात
स्पष्ट हो गयी कि ब्राह्मण होने के बाद भी आपको रिस्तो का बोध नहीं है, हिन्दू में होने वाले दो प्रकार के विवाह "अनुलोम विवाह" और "प्रतिलोम विवाह" और उनसे उत्पन संताने ही जड़ वर्ण व्यवस्था का आधार है हिन्दू व्यवस्था के जानकार अपने खानदानियो से पूछ लेना की आप मेरे मामा हो की नहीं? क्योकि जब मैं समझाऊंगा तो आपके पैर से जमीन खिसक जाएगी आप के दिमाग में जो फितूर भरा हुआ है जब तक वो नहीं निकल जाता कोई भी उत्तर देना वेकार है  इसीलिए मैं पहले ही कह चूका हूँ  वात वहुत छोटी सी है पर समझना वहुत कठिन है { .......आपके इन सरल से प्रश्नों का उत्तर भी बहुत सरल है, किन्तु इसे समझना बहुत कठिन है। ......... क्या सभी अनार्यो को आतातायी शासक राम ने मर डाला था ? शेष अनार्य (द्रविण /राक्षस) कहा गये ? }

जो मित्र मुझसे असहमत हैं k.mittra@rediffmail.com पर ई-मेल कर सकते हैं अथवा 09335122064 पर संपर्क करें। ब्लोग्स में टिपण्णी कर सकते "अनार्यो की खोज "(http://anaryokikhoj.blogspot.in/2012/11/0-1.html ) "आगे की यात्रा" (http://aagekiyatra.blogspot.in) आचार्य रजनीश एक नवीन विचारधारा (http://aacharyrajneesh.blogspot.in/2012/11/blog-post_12.html) हैं।

Saturday, November 17, 2012

संकाओ का समाधान

आदरणीय डा0 रेवा नंदन द्विवेदी जी उर्फ़ मामा जी,

आपने हमसे चार प्रश्न एक सुझाव और एक टिपण्णी भेजी है जो निम्नवत है।
{
1.
Hi Kamlesh,
Reva Nandan Dwivedi commented on your status.
Reva wrote: "मित्रा जी , बताइए शुद्र कौन है ,?"
2. Hi Kamlesh,
Reva Nandan Dwivedi commented on your status.
Reva wrote: "क्षत्रिय कौन है ?"

3. Hi Kamlesh,
Reva Nandan Dwivedi commented on your status.
Reva wrote: "वैश्य कौन है ?"
4. Hi Kamlesh,
Reva Nandan Dwivedi commented on your status.
Reva wrote: "ब्राहमण कौन है ?"

5. Hi Kamlesh,
Reva Nandan Dwivedi commented on your status.
Reva wrote: "विषय बड़े गंभीर है अतः उत्तर भी समझ कर दीजियेगा"

6. Hi Kamlesh,
Reva Nandan Dwivedi commented on your status.
Reva wrote: "mitra ji , maine placement company to nahi kbhol rakhi hai , is samay pura world mandi me gujar raha hai ,jo yogy hai usko job jarur mil rahi hai"
}

मैं आपकी सभी संकाओ का समाधान करूँगा, आपके इन सरल से प्रश्नों का उत्तर भी बहुत सरल है, किन्तु इसे समझना बहुत कठिन है। ठीक उस परमात्मा की तरह इसे भी समझना काफी विवादित है। वर्ण व्यवस्था को समझने की भी दो पद्दतियाँ है, आपको किस पद्दति से समझाऊ इसको समझने के लिए मुझे आपसे एक प्रश्न का उत्तर पाना अति आवश्यक है जितनी जल्दी आप मेरे इस प्रश्न का उत्तर दें देगें उतनी ही जल्दी मैं आपकी संकाओ का समाधान कर सकूँगा। प्रश्न है :-

क्या सभी अनार्यो को आतातायी शासक राम ने मर डाला था ? शेष अनार्य (द्रविण /राक्षस) कहा गये ?

जो मित्र मुझसे असहमत हैं k.mittra@rediffmail.com पर ई-मेल कर सकते हैं अथवा 09335122064 पर संपर्क करें।  ब्लोग्स में टिपण्णी कर सकते  "अनार्यो की खोज "(http://anaryokikhoj.blogspot.in/2012/11/0-1.html ) "आगे की यात्रा" (http://aagekiyatra.blogspot.in)  आचार्य रजनीश एक नवीन विचारधारा   (http://aacharyrajneesh.blogspot.in/2012/11/blog-post_12.html) हैं।