स्त्री की नाक काटना धर्म है। बधायी किस बात की ? आताताई के विजयी होने
की, सूपनखा यदि रावन की वहन न होती तो किसी को भी इस स्त्री दुराचार का
पता तक न चलता।
इसीलिए जाति प्रथा समाप्त नहीं हो सकी
और सैकड़ो बरस देश गुलाम रहा, शूद्र रावन के वंसज है और यह कभी हिन्दू
धर्म के अंग नहीं रहे, और न समझे गए। नाक तो आज भी हरियाणा में कटी जा रही
है। देश को वास्तब में विश्व गुरु बनाना है तो दशहरा मनाना बंद करना पड़ेगा।
यह शूद्रो के अपमान का प्रतिक है अन्यथा यह गृह युद्ध बंद नहीं होगा (शीत
युद्ध) और हर डा0 आंबेडकर अंग्रेजो का समर्थक होगा। सोच लो 800 साल की
गुलामी की है और आगे कितनी करनी है? FDI से वास्तविक हानि किसकी है, सेवक
तो हमेसा सेवक ही रहेगा क्या फर्क पड़ता है मालिक कौन है ? हमने
गोरे अंग्रेज भी देखे और काले अंग्रेज भी देखे, हम तब भी लूटे जा रहे थे और
हम आज भी लूटे जा रहे है, जड़, जमींन, जंगल सब कुछ तो लूट लिया रोजगार का
कोई साधन तो नहीं छोड़ा हमारे पास हमें तो दूसरे की नौकरी ही करनी है। तो
क्या फर्क पड़ता है मालिक देशी है या विदेशी हजारो बर्षो से हमारे जख्मो पर
नामक छिड़कने बाले हमारे कभी नहीं हो सकते है।
No comments:
Post a Comment